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Wednesday, November 27, 2019

प्रदूषण

प्रदूषण

साँस संभल कर लेना अब तो हवा विषैली है।
मिट्टी पानी ने यह दुर्गति पहले झेली है।

हुई कुपोषित है थाली की दाल, भात, तरकारी,
कैसे तन को पोषण दें हम, दिखती है लाचारी।
अब सुनते हैं सुबह टहलना, रोगों को न्योता है,
बोतल बन्द नीर का धन्धा, चोखा होता है।

भोगवाद की आँधी में, आशा की किरण भी धुँधली है।
साँस संभल कर लेना अब तो हवा विषैली है।
-- अनुराग

Sunday, December 18, 2016

धूप प्रेयसी

धूप प्रेयसी

धूप प्रेयसी आँगन उतरी,
कुहरे का पट खोल।
मिलने निकल पड़े सब बाहर,
यह पल है अनमोल।

नर्म गुनगुनी धूप सुहाती,
सहलाती तन-मन को।
बचपन सी चंचलता देती,
कठुआए जीवन को।
रह रह कर है बैरन पछुआ,
देती ठंडक घोल।
धूप प्रेयसी आँगन उतरी,
कुहरे का पट खोल।

बाटी चोखा दिन में जमता,
बीच-बीच में चाय।
बच्चे छत पर गुड्डी ताने,
पेंचा रहे लड़ाय।
हुई शाम, घर में घुस जाते,
दरवाज़ा मत खोल।
धूप प्रेयसी आँगन उतरी,
              कुहरे का पट खोल।                

Monday, May 16, 2016

देवदार

देवदार
 
कुदरत का अनुपम उपहार,
यह देवदार।
झुरमुटों की ओट से
रवि झाँकता,
होता विहान।
पत्र पूरित डाल बिनतीं
छाँव का
अद्भुत वितान।
ऋषि सरीखा, खड़ा तनकर,
ऊर्ध्वगामी,
निर्विकार।
यह देवदार।
प्रकृति का हर रोष पहले
झेलता
अपने बदन पर।
बाँध रखता गिरि धरा को,
अभय देता
है निरंतर।
गिरि सभ्यता का
यह रहा
जीवन आधार।
यह देवदार।
शिव लीला का रहा साक्षी,
कालिदास का
श्लोक।
गिरि के सोपानों पर इसका
हरा भरा हो
लोक।
इसकी रक्षा का अब हमको
लेना होगा
भार।
यह देवदार।

Thursday, November 19, 2015

युद्ध

युद्ध

इस दुनिया में
युद्ध से क्या घबराना;
यहाँ
-
जन्म से मृत्यु तक

लड़ना पड़ता है
एक युद्ध।
युद्ध अनवरत चलता रहता है
कभी वैचारिक अन्तर्द्वन्द्वों का रूप धर
मन के भीतर,
कभी बाहर।

इस दुनिया में
जब
साथ साथ हैं;
सत्य - असत्य
,
ब्रह्म - माया
,
अच्छाई - बुराई
,
न्याय - अन्याय
,
तब

युद्ध तो अनिवार्य है।
निरपेक्ष
कोई नहीं रह सकता,
रहना भी नहीं चाहिए।

इस दुनिया में
शान्ति;
एक दार्शनिक विचार अधिक है
,
हकीकत कम।

शान्ति स्थापित करने के लिए भी
हमें लड़ना पड़ता है
एक युद्ध।
हाँ,
फ़ैसला हमें करना है
,
हम किसके साथ हैं
,
किसके विरुद्ध।

Saturday, May 2, 2015

जी लें हर इक पल को

जी लें हर इक पल को

क्यों सोचें हम कल को।
जी लें हर इक पल को।
बीत गया जो पल 
ना हो पाया अपना,
आने वाला कल भी है 
केवल सपना।
प्रश्न खड़े करने से ज़्यादा,
सोचें उसके हल को।
क्यों सोचें हम कल को।
जी लें हर इक पल को।

हम अतीत से सबक सीख कर
आज सँवारें,
करें भली इक पहल,
वक्त के सच स्वीकारें।
निखरेगा हर पल, आने दें
आने वाले कल को।
क्यों सोचें हम कल को।
जी लें हर इक पल को।

Tuesday, February 24, 2015

मैं हूँ बेताब....

मैं हूँ बेताब....

मैं हूँ बेताब तुमसे मिलने को।
जाँ भी बेताब है निकलने को।

खत्म होता है अब सफ़र मेरा,
सूर्य भी जा रहा है ढलने को।

रात के बाद फिर सहर होगी,
मैं रहूँगा न आँख मलने को।

मैं चला, साथ मेरे कर्म चले,
कुछ न राज़ी है साथ चलने को।

माफ़ करना मेरी खताओं को,
मैं चला अपने रब से मिलने को।
                                   

Thursday, February 5, 2015

फगुनहट

फगुनहट


चली फगुनहट, धूल उड़ाती।

बीत गयी ऋतु कठिन शीत की,
वस्त्रों का कुछ भार घटा।
पेड़ों के पीले पात झड़े,
हरियाली की चहुँओर छटा।
भ्रमर गीत गुंजन सुन सुन
नव कलिका मुसकाती।
चली फगुनहट, धूल उड़ाती।

सीटी बजाती, खिलखिलाती,
खेलती है बाग वन।
ओढ़ चूनर पीत वर्णी,
बन गयी धरती दुल्हन।
होली के प्रेम पगे,
रंग बिखराती।
चली फगुनहट, धूल उड़ाती।

दिन में लगती भली,
रात में देती सिहरन।
रूखी सी, पपड़ाई,
माँगती है तेल, उबटन।
नूतन संवत्सर की
आहट दे जाती।

चली फगुनहट, धूल उड़ाती।

Wednesday, January 28, 2015

मेरे हिस्से में…..

मेरे हिस्से में…..

मेरे हिस्से में फ़र्ज़ गिरे,
अधिकार तुम्हारे हिस्से में।
मेरे हिस्से में तनहाई,
संसार तुम्हारे हिस्से में।

ऊपर वाले ने किस्मत के
मोती जब बाँटे थे,
मैं किंचित पीछे खड़ा हुआ था,
मेरे हिस्से में घाटे थे।
मुझको मिलती है रुसवाई,
सत्कार तुम्हारे हिस्से में।
मेरे हिस्से में फ़र्ज़ गिरे,
अधिकार तुम्हारे हिस्से में।

एक अधूरापन सा मैने,
जीवन भर महसूस किया।
खुश हुआ तुम्हारी खुशी देख,
तेरे ग़म से परेशान हुआ।
दे अपने अश्रु मुझे, ले लो
उपहार तुम्हारे हिस्से में।
मेरे हिस्से में फ़र्ज़ गिरे,
अधिकार तुम्हारे हिस्से में।



Monday, January 12, 2015

सूरज खेले आँख मिचौनी

सूरज खेले आँख मिचौनी

सूरज खेले
आँख मिचौनी।

छिपे कभी
बादल के पीछे,
अगले ही पल
सम्मुख आये।
कभी कभी ये
ओढ़ रजाई
कुहरे की
दिन भर सो जाये।
जाड़े में है
मरहम लगती
धूप गुनगुनी।
सूरज खेले
आँख मिचौनी।

भोर समय
नदिया की धारा
में लगता है
लाल कमल सा।
लहरों के
झूले में झूले,
ऊपर नीचे,
कुछ डूबा सा।
गर्मी में क्यों
क्रोधित हो
बरसाए अग्नि।
सूरज खेले
आँख मिचौनी।

उषा किरण
हिमगिरि शिखरों पर
मणि माला बन
छा जाती।
अगले ही पल
पूरी घाटी
उजली धूप में
नहा जाती।
शाम सुहानी
सिंदूरी सी
करे निशा अगवानी।
सूरज खेले
आँख मिचौनी।

बादल, कुहरा,
शीत लहर सब,
बन गये
षड्यन्त्रकारी।
सेवा व्रती
रवि किरण तेरी
कुछ पल छिपी, पर
कभी न हारी।
नित्य भोर से
शाम ढले तक
लिखते श्रम की
नयी कहानी।
सूरज खेले
आँख मिचौनी।

रात्रि, दिवस,
ॠतुएँ हैं तुमसे,
तुमसे है
जीवन।
अपनी किरणों
से कर दो
आलोकित
मेरा मन।
इन्द्र धनुष के
रंगों से
भर जाए अवनि।
सूरज खेले

आँख मिचौनी।

Tuesday, December 30, 2014

अभिनन्दन, नव वर्ष तुम्हारा


 अभिनन्दन, नव वर्ष तुम्हारा

अभिनन्दन,
नव वर्ष तुम्हारा।

नयी भोर है,
नयी उमंगें,
नया जोश है,
हर जन मन में।
शुभ हो मेरा,
सबका शुभ हो,
नहीं किसी
जीवन में दुख हो।
रोग, दोष, भय,
भागे सारा।
अभिनन्दन,
नव वर्ष तुम्हारा।

कर न पाये
आज तलक जो,
करें इस बरस
हम सब मिल वो।
सबके जीवन
में सुधार हो,
मानवता की जय
बार बार हो।
बहे प्रेम
सरिता की धारा।
अभिनन्दन,
नव वर्ष तुम्हारा।




Thursday, December 25, 2014

जी रहे हैं हम...

जी रहे हैं हम...

जी रहे हैं हम,
या कि
जीवन काटते हैं ?

ओढ़ बैठे रूढ़ियाँ
आस्था के नाम पर,
हैं ज़हालत बाँटते
धर्म के व्यापार घर।
त्याग कर के
सहज जीवन,
हम बनावट बाँटते हैं।
जी रहे हैं हम,
या कि
जीवन काटते हैं ?

ताज़ी हवाएँ अनवरत हैं
खटखटाती द्वार,
क्यों न कर पाते हैं हम
सत्य को स्वीकार ?
त्याग कर सारे अहं
हम प्यार
क्यों न बाँटते हैं ?
जी रहे हैं हम,
या कि
जीवन काटते हैं ?

अनेकानेक द्वन्द्वों में
घिरी है ज़िन्दगी,
आत्मा की ध्वनि सरल
किसने सुनी ?
अन्त में अक्सर
स्वयं को
धिक्कारते हैं।
जी रहे हैं हम,
या कि
जीवन काटते हैं ?


Saturday, December 6, 2014

जीवन में यदि कुछ पाना है...

जीवन में यदि कुछ पाना है...

जीवन में यदि कुछ पाना है,
चलना तो हमको ही होगा।
जीवन पथ रौशन करने को
जलना तो हमको ही होगा।

मानता हूँ ज़िन्दगी काँटों भरी है,
फूल भी खिलते इसी में हैं मगर।
लाख हों दुश्वारियाँ लेकिन इन्हीं से
जूझना पड़ता हमें है उम्र भर।
स्वीकार करके हर चुनौती ज़िन्दगी में,
लड़ना तो हमको ही होगा।
जीवन में यदि कुछ पाना है,
चलना तो हमको ही होगा।

हैं भ्रमित करतीं हमें निज लक्ष्य से
धूप हो या फिर घनेरी छाँव हो।
प्रतिपल लुभातीं रंगरलियाँ हैं जगत की
धँस रहा गहरे भले ही पाँव हो।
ऊर्ध्वगामी दृष्टि, थिर मन बुद्धि लेकर
बढ़ना तो हमको ही होगा।
जीवन में यदि कुछ पाना है,
चलना तो हमको ही होगा।

Wednesday, December 3, 2014

धूप

धूप

धूप धरा पर उतरी,
जैसे, 
जीवन उतरा।

पशु, पक्षी, मानव सब निकले,
अपने अपने गेह से,
सूरज की किरणें मिलतीं हैं,
सबसे अतिशय स्नेह से।
थमी ओस की बारिश,
घटा,
शीत का पहरा।
धूप धरा पर उतरी,
जैसे,
जीवन उतरा।

बीज अंकुरित हुए ज़मीं में
जीवन नया बसाया,
पुरुष प्रकृति का मिलन सुहाना
सबके मन को भाया।
कोयल नाच उठी उपवन में
बाँध शीश पर सहरा।
धूप धरा पर उतरी
जैसे

जीवन उतरा।

Wednesday, November 26, 2014

मैं कविता लिखता नहीं

मैं कविता लिखता नहीं 

मैं कविता लिखता नहीं,
वह लिखवा देता है।
उसकी प्रेरणा से
कभी कभी
मन करता है,
कागज़ कलम ले कर
बैठ जाने को।
मन में
बादलों की तरह
उमड़ने लगते हैं
भाव, विचार और अनुभूतियाँ।
कलम अपने आप
कागज़ पर
नाचने लगती है
और शब्द दर शब्द
पंक्ति दर पंक्ति
कागज़ पर उतर जाती है
एक सुलेखा कविता।