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Tuesday, June 7, 2016

गज़ल

गज़ल 
ज़ख़्म गैरों को दिखाते क्यूँ हो।
वक्त अपना यूँ गँवाते क्यूँ हो।
रास्ते जिनपे खुद चले ही नहीं,
उनको औरों को दिखाते क्यूँ हो।
मैं सुकूँ से हूँ, मुझे छेड़ो मत,
याद आ आ के सताते क्यूँ हो।
राह में फूल भी हैं, काँटे भी,
दिल को बेताब बनाते क्यूँ हो।
जब पता है कि सब मुसाफ़िर हैं,
बेवजह दिल को लगाते क्यूँ हो।

Friday, April 11, 2014

ग़ज़ल - पूछते हो.....


ग़ज़ल - पूछते हो.....  

पूछते   हो तुम पता भगवान का।
मिलना मुश्किल है यहाँ इन्सान का।

लाख मुश्किल झेलने के बाद भी,
है हौसला कायम अभी ईमान का।

हर तरफ़ कंक्रीट के जंगल उगे,
ढूँढ़ना मुश्किल हुआ मैदान का।

रुख कभी तो गाँव की भी ओर कर लें,
दर्द सुन लें खेत का, खालिहान का।

इस जहाँ में इक अकेली माँ ही है,
बिन कहे जो मन पढ़े संतान का।

Sunday, January 12, 2014

मज़ा ज़िन्दगी का.....

 मज़ा ज़िन्दगी का.....

मज़ा ज़िन्दगी का लिए जा रहा हूँ। 
जैसी भी है ये, जिए जा रहा हूँ।

गिला है न शिकवा, मुझको किसी से,
पिलाता है वो, मैं पिये जा रहा हूँ

मेरी अर्ज़ सुनना, है काम तेरा,
ये फितरत है मेरी, किए जा रहा हूँ।

बहुन सर्द है आज बाहर का मौसम,
मै चादर पुरानी सिये जा रहा हूँ।

मयस्सर है मुश्किल से दो जून रोटी,
मैं दिन रात मेहनत किये जा रहा हूँ।

Thursday, January 17, 2013

गज़ल - मुझसे तुम्हारी दूरी

गज़ल

मुझसे तुम्हारी दूरी जितनी कम हो पायी है।

बस वही मेरी ज़िन्दगी की कमाई है।


क्या कमाया, खर्च किया, बचाया कितना,

तमाम उम्र इसी हिसाब में गँवाई है।


ज़रूरतों का इन्तज़ाम तो कर दिया था उसने,

ये कम्बख्त तबियत मगर, उसमें कब समाई है।


हसरतों की भीड़ में, चुक गयी उम्र तमाम,

याद कर के बता, कभी उसकी याद आई है।


कमाया यहीं से, यहीं पे सब छोड़ दिया,

दुनियाँ की दौलत कभी साथ न जा पाई है।

Thursday, November 8, 2012

गज़ल - तुम्हें ढूँढ़ते

गज़ल 

तुम्हें ढूँढ़ते हम ज़माने में हारे । 
मिले नाथ आखिर हृदय मे हमारे।

मैं चलता रहा आज तक जिसके दम पर,

वो ताकत तुम्हारी ही रहमत थी प्यारे।

विचारों के, कर्मों के प्रेरक तुम्ही थे,

तुम्हीं से हुए पूरे संकल्प सारे।

रहे साथ चलते, सखा भाव से तुम,

न पहचान पाया, मुकद्दर हमारे।

ये साँसें तुम्हारी अमानत हैं मालिक,

करूँ आज खुद को हवाले तुम्हारे।

Wednesday, November 7, 2012

गज़ल - बन्धनों से अब मुझे

गज़ल

बन्धनों से अब मुझे उपराम कर मेरे सखा, 
मुक्त हो आकाश में निर्भय विचरना चाहता हूँ।

बाँध कर घुँघरू, जगत की ताल पर नाचा बहुत,
तोड़ सारे बंध अब, प्रिय को रिझाना चाहता हूँ।

गा चुका मैं गीत सारे, पर न भाया कुछ तुम्हें,
मन की वीणा की नयी इक धुन सुनाना चाहता हूँ।

साँस जब तक साथ देगी, मैं लड़ूँगा आँधियों से,
मैं खुदी को बन्दगी का शै बनाना चाहता हूँ।

इतनी ताकत, इतनी हिम्मत, इतनी दौलत दे मुझे,
मैं सभी के ज़ख्म पर मरहम लगाना चाहता हूँ।

Tuesday, November 6, 2012

गज़ल - प्यार की बात करें

 गज़ल 

प्यार की बात करें, नेह की बरसात करें।
गिरा के बीच की सब दीवारें, इन्सानियत की बात करें।

इन्सानी रिश्तों के बीच जमी बर्फ़ तभी पिघलेगी,
खुले दिमाग से मिल बैठ के जब बात करें।

कहो कुछ तुम भी, कुछ हम भी अपनी बात कहें,
रहें कुछ दूर भले, हँस के मुलाकात करें।

खुदा ने बख्शी है हमें नेमत चन्द साँसों की,
गिले शिकवों में न वक्त को बरबाद करें।

गज़ल - मेरी माँ अब भी ज़िन्दा है

  गज़ल
 
मेरी माँ अब भी ज़िन्दा है, भले उसका बदन न हो,
मैं उसके साथ हूँ न हूँ, वो मेरे साथ रहती है।

वही कहता हूँ मैं, जो खुद महसूस करता हूँ,
सदा मैं सुन नहीं सकता, दुआ पर साथ रहती है।

हवा की शक्ल औ‘ सूरत कभी देखी है क्या तुमने,
भले वो दिख नहीं सकती, हमेशा साथ रहती है।

नदी है ज़िन्दगी अपनी, इसे कब बाँध सकते हैं,
समंदर की ये बेटी है, उसी की ओर बहती है।

बयॉँ हो हर खुशी लब से, ये नामुमकिन है,
नशा हो जाए जब उसका, जु़बॉँ चुपचाप रहती है।

अरे नादाँ, कभी उसका शुक्रिया भी कह,
हमेशा तेरे लब पे इक नयी फ़रियाद रहती है।

गज़ल - मैं हर इक तूफान से जम कर लड़ा हूँ

गज़ल

मैं हर इक तूफान से जम कर लड़ा हूँ।
थाम कर मैं वक्त की उँगली खड़ा हूँ।

क्या बिगाडेगा ये जमाना मेरा
अपने मालिक की पनाहों में खड़ा हूँ।

बन उजाला, मैं अँधेरों से लड़ा हूँ,
धार बन, पत्थर हटा, आगे बढ़ा हूँ ,

आग बन मैने जलाया है विकारों को ,
फौलाद बन मैं जुल्म के आगे खड़ा हूँ।

अब न मुझको दूर करना ऐ मेरे बंदा नवाज,
मै तुम्हें पाने को जन्मों तक लड़ा हूँ।

Saturday, November 3, 2012

गज़ल - आओ मिल बैठ कर

गज़ल

आओ मिल बैठ कर कुछ जि़न्‍दगी की बात करें।
क्‍यूँ न हम आज इक नयी शुरुआत करें।
 
लड़ रहे हैं मुद्‌दत से मगर हुआ न कुछ हासिल,
भुला कर गिले शिकवों को, दोस्‍ती की बात करें।
 
सफ़र में तुम भी हो साहब, सफ़र में हम भी हैं,
हँसी खुशी ये गुज़र जाए, वो करामात करें।
 
सियाह रात है पसरी, नज़र न कुछ आता,
दिया जलाओ तो पहले, फिर सहर की बात करें।
 
हम यहाँ उलझे हैं उन चीजों में, जो अपनी ना हैं,
आओ पहचान करें खुद से, खुद की बात करें।

Saturday, June 23, 2012

गज़ल - फिसलन भरी डगर में


गज़ल 

फिसलन भरी डगर में, कहीं मैं भटक न जाऊँ
ऐ रब मुझे बचाना, डरने लगा हूँ मैं।

तेरे इश्क में दीवाना, यूँ ही रहूँ हमेशा,
मेरे सामने ही रहना, तेरे सामने हूँ मैं।

जीने नहीं है देती, दुनिया किसी तरह से
तेरे हर इक करम पे, मरने लगा हूँ मैं।

बाहर की मौज झूठी, भीतर का मौन सच्चा
अब कर नजर इनायत, सँवरने लगा हूँ मैं।

जब तक रहूँ सफर में, मेरी बाँह थामे रखना,
दुनिया के इस भरम में, भटकने लगा हूँ मैं।

Friday, June 22, 2012

गज़ल - देखे हैं हमने ज़िन्दगी के

गज़ल
 देखे हैं हमने ज़िन्दगी के रूप कई, अंदाज़ कई।
है हसीं ख्वाब कभी तो कभी इक जंग है ये।

किसी के लब पे तवस्सुम खिला कर देखो।
सुकून पाने का अपना तो अजब ढंग है ये।

सरे जहान ये लगता है कि मैं तनहा हूँ।
है न कुछ और, यादों का तेरी रंग है ये।

जहाँ में आ के न छोड़ कभी कश्ती-ए-उम्मीद।
यकीन कर, मिलेगी मंज़िल, गर संग है ये।

मौत आये भी तो गम नहीं है मुझको।
आखिर इस ज़िन्दगी का अंग है ये।

Wednesday, June 20, 2012

गज़ल - ज़िन्दगी बख्शी है

गज़ल
 

ज़िन्दगी बख्शी है तुमने हमको तो हम जीते हैं।
जख्म पाते हैं औ’ खूँ के घूँट पीते हैं।

छिपाये बैठे हैं सीने में ज़माने के सितमोगम,
ज़ुबाँ चुप है, लब हँस के ज़हर पीते हैं।

इस गुलिस्ताँ का कोई गुल नही मेरी खातिर,
हर गुंच उनकी शै है, हम खारों के लिए जीते हैं।

शमाँ उम्मीद की जो इक, दिल-ए-फ़ानूस में जलती,
बुझे जब-जब तभी मरते, रही रौशन तो जीते हैं।

Wednesday, June 6, 2012

गज़ल - अभी कल तक जो रिश्ते


गज़ल

अभी कल तक जो रिश्ते जताते थे मुझसे,
आज पूछूँ भी तो नज़रें वे चुरा लेते हैं।

सबसे जा जा के अपना दर्द क्या कहना,
यही सोच के आँखों में आँसू छिपा बैठे हैं।

सब नहीं हैं इस जहाँ में ऐसे यारों,
जो दौड़ के दुख दर्द बँटा लेते हैं।

मेरी नज़रों में निरा पत्थर भी भला उनसे,
जो लोग केवल खुद के लिए जीते हैं।

भूल तो सबसे हो ही जाती है मगर,
ठीक कर लें जो उन्हें, वे बुरे न होते हैं।