Showing posts with label शेर. Show all posts
Showing posts with label शेर. Show all posts

Friday, June 22, 2012

शेर

शेर
 
ख़्वाहिशों में मसरूफ़, दो पल, खुद के लिए भी निकाल,

क्या जिया, अगर दो पल, अपने लिए न जी पाया।

शेर

शेर

ख्वाब बन के रह गयीं मेरे दिल की तमन्नाएँ,
इस जहाँ में ठोकरों के सिवा कुछ न रहा।
..........

क्यूँ अब ये दुनियाँ मुझसे वास्ता रखे,
इस जहाँ में मेरा बचा ही क्या है।
.........

सारा जग मुझसे आँख चुराता है क्यूँ,
शायद मतलब निकल गया है, इसलिए।
.........

तनहाई-ए-शब में जब दुनियाँ तमाम सोती है।

जागता हूँ मैं औ' ये आँख मेरी रोती है।